देवली के जैन मंदिर में चातुर्मास कर रहे मुनि सुप्रभसागर महाराज ने दस लक्षण पर्व के तीसरे दिन उत्तम आर्जव धर्म का विवेचन करते हुए कहा कि जब सर्प को अपनी बांबी में जाना हो, तो वह सीधा होकर ही जाता है, वैसे व्यक्ति को अपने अन्तरंग आत्मा में जाना है, तो उसे अपने मन वचन काम में सरलता लाना होगा।
मुनि ने कहा कि यदि व्यक्ति का व्यवहार कपटपूर्ण है, तो वह विश्वसनीय नहीं हो सकता है। जो दूसरे को धोखा देता है, वह दूसरों को नहीं स्वयं को धोखा दे रहा है। सरल आचरण व्यवहार वाले का जीवन निर्विकल्प और निर्भय रहता है। कुटिलतापूर्ण व्यवहार और घुमावदार बातें करने वाला संसार के चक्कर काटता रहता है। मोक्ष प्राप्ति ऋजु गति से ही होती है। कपट मित्रता संबंधों में बिखराव लाता है। सरलता पूर्ण व्यवहार करने वाला वर्तमान में दुःखी बिककर दिखता है, परन्तु आगे वह सुखी होगा। धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि वैराग्य सागर महाराज ने कहा कि छल कपट करने वाला किसी का भी प्रिय नहीं हो सकता है। माता-पिता, गुरु मित्र कोई भी उसका अपने साथ नहीं रखता है। कपट दबा रहे परन्तु वह समय पाकर व्यक्ति को नष्ट कर देता है। आर्जव धर्म को धारण करने वाला स्वयं सुखी-और शान्त होता है और दूसरों को भी सुखी शान्त करता है। इस दोरान आचार्य वर्धमान सागर महाराज के अवतरण दिवस पर संगीतमय पूजन किया गया।
छल कपट करने वाला किसी का भी प्रिय नहीं हो सकता - जैन मुनि










