देवली के महावीर दिगम्बर जैन मंदिर में धर्म सभा को उद्बोधन देते हुए मुनि सुप्रभसागर महाराज ने बताया कि जिनेन्द्र भगवान् के अभिषेक जल को अपने मस्तक एवं नेत्र पर धारण करने वाले को लौकिक सम्पदा के साथ परालौकिक सम्पदा की प्राप्त होती है।
मुनि ने आगे कहा कि एक विशल्या ने पूर्व भव में तपश्चरण कर सर्वोषधि से युक्त शरीर को प्राप्त किया, तब मन्त्रों से अभिमंत्रित श्री जी के अभिषेक जल से शरीर के रोग नष्ट हो जाए, तो क्या आश्चर्य है। मंत्रोच्चारण के साथ छोडी गई जलधार उस मंत्र से मंत्रित होकर लौकिक संकट को दूर कर देता है। भगवान् के अभिषेक जल को आदरपूर्वक धारण करने वाला नागेन्द्र, देवेन्द्र, चक्रवर्ती पद को प्राप्त कर अन्त में जिनेन्द्र पद को भी प्राप्त करता है। भगवान की भक्ति करते हुए भक्त भावना भाता है कि भगवन यह पुण्य अवसर पुनः मिले। ऐसा पुण्यदिन हमेशा प्राप्त हो। सभा को सम्बोधित करते हुए मुनि वैराग्य सागर महाराज ने कहा कि आज व्यक्ति आहार, भय, मैथुन और परिग्रह के कारण कष्ट पाता है। मिथ्यादृष्टि चारों संज्ञा में फंसकर अपने आत्म तत्त्व को भूल जाता है। जैसे शराबी अपने घर के बाहर खड़ा होकर भी उसे ढूंढता रहता है। मोह के नशे में संसारी निजघर आत्मा को यहाँ-वहाँ ढूंढ रहा है जबकि वह उसके अन्दर ही विद्यमान है।
व्यक्ति आहार, भय और परिग्रह के कारण कष्ट पाता है - जैन मुनि










