श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर देवली में गणिनी आर्यिका विज्ञाश्री माताजी के ससंघ सानिध्य में प्रातः अभिषेक शांतिधारा के तत्पश्चात गुरुमाँ ने प्रवचन देते हुए कहा कि अहंकार एक ऐसा वृक्ष है जो बिना बीज के उग जाता है। अहंकार में कभी अकड़ना नहीं क्योंकि अकड़ना मुर्दे की पहचान है और झुकना इंसान बनने की पहचान है।
उन्होंने कहा कि लोहा जब नरम होता है तो सांकल आदि बनती है, सोना नरम होता है तो आभूषण बनते हैं, आटा नरम होता है तो रोटी बनती है, मिट्टी नरम होती है तो घड़ा बनता है। इसी प्रकार जब मनुष्य नरम होता है अर्थात झुकता है तो वह भगवान बनता है। उन्होंने कहा कि अहंकार बिना बोये ही मन में उग आता है। अकड़ना निर्जीवता का प्रतीक है, जबकि विनम्रता व कोमलता ही सृजन का आधार है। जैसे लोहा, सोना, आटा और मिट्टी नरम होकर ही उपयोगी व सुंदर रूप लेते हैं, वैसे ही नरम हृदय वाला मनुष्य ही ईश्वरत्व को प्राप्त करता है। प्रवक्ता अंकित जैन डाबर ने बताया कि 19 अप्रैल अक्षय तृतीया पर विशेष पढगहन के बाद इशू रस का आयोजन किया जाएगा।
अकड़ना मुर्दे की पहचान है और झुकना इंसान बनने की पहचान है - विज्ञाश्री माताजी










