देवली के श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर में विराजमान भारत गौरव गणिनी गुरुमाँ विज्ञाश्री माताजी ने प्रवचन देते हुए कहा कि कठिनाइयों से जूझता इंसान जब इनसे बाहर निकलता है तो बहुत मजबूत बन जाता है।
उन्होंने कहा कि कठिनाइयों से जूझने के लिए कभी-कभी ईश्वरीय संकेत आता है, जो इस संकेत को समझ लेता है और पुरुषार्थ करता है, वही संघर्ष के दरिया को पार कर लेता है। कठिनाइयों में कुछ ऐसा रसायन है जो आदमी को फौलाद बना देता है। हर साधक का जीवन इन्हीं भीषण कठिनाइयों से होकर गुजरता है। पुरुषार्थ का चरम तपस्या कहलाती है और तपस्या इन्हीं चरम विपरीतताओं के बीच सम्पन्न होती है। इसी कारण साधक और तपस्वी का जीवन सदा विपरीत परिस्थितियों से होकर गुजरता रहता है। अर्जुन को दिव्यास्त्र इन्हीं चरम प्रतिकूलताओं के बीच मिले। बारह वर्ष के वनवास के दौरान पल-पल उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने इस चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया और इनसे धैर्य व साहस पूर्वक उबर सके। जो बलशाली भीम - गदा भांजने में दक्ष थे, उन्हें नौकर बनकर खाना बनाने के लिए कलछुल चलाना पड़ा। युधिष्ठिर को दास बनना पड़ा। इसी प्रकार श्रीराम यदि केवल अयोध्या में रहते और चौदह वर्ष के लिए वन न जाते तो उनके शौर्य पराक्रम का पता कैसे चलता। वे निखरकर भी न आते और असुरता भी न मिटती।
कठिनाइयों से जूझता इंसान फौलाद बन जाता है - विज्ञाश्री माताजी










