श्री महावीर दिगम्बर जैन मंदिर देवली में मुनि 108 वैराग्य सागर महाराज एवं मुनि 108 सुप्रभ सागर महाराज के सानिध्य में आष्टानिका महापर्व के तीसरे दिन 32 अर्घ समर्पित किये गए।
मुनि सुप्रभ सागर ने कहा कि ये 32 अर्घ्य मूल रूप से सिद्ध परमेष्ठी के सोलह गुणों (8 मूल गुण और 16 कारण भावनाएं) और षोडश (16) कारण भावनाओं से जुड़े होते हैं। जो आत्मशुद्धि, संयम, सदाचार एवं आध्यात्मिक उन्नति का संदेश देता है। इस विधान के माध्यम से श्रद्धालु अपने जीवन में सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान एवं सम्यक चरित्र को अपनाने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। इस अवसर पर अभिषेक, शांति धारा, मुनि के पाद प्रक्षालन ओर शास्त्र भेंट किया गया। विधान में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता कर भगवान जिनेन्द्र देव की आराधना की तथा विश्व शांति, समाज की उन्नति एवं समस्त प्राणियों के कल्याण की मंगलकामना की।
श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के तीसरे दिन 32 अर्घ समर्पित










