देवली में चल रहे शान्ति सिन्धु व्यक्तित्व परिचर्चा के द्वितीय दिवस मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने बताया कि जीवन में कई आई बाधाओं को सहनकर अपनी साधना को सुदृढ कर आचार्य शान्ति सागर महामुनिराज ने वर्तमान श्रमणों के लिए प्रायोगिक रूप से मूलाचार का ज्ञान प्रदान किया।
मुनि ने आगे बताया कि आचार्य महाराज ने कई भव्य जीवों को दीक्षा देकर उनका मोक्षमार्ग प्रशस्त किया। आचार्य महाराज ने 5 बार सर्पकृत उपसर्ग सहे। ज्योतिष शास्त्र कहता है फि जिस व्यक्ति पर 5 बार सर्प चढ़ जाए, वह महा-पुरुष होता है। साधना में कई बार कठिनाईयाँ आई पर वे अपने व्रतों से थोडे भी नहीं डिगे। आचार्य महाराज ने उत्तर भारत में चतुर्मास कर धर्म की प्रभावना की और भव्य जीवों मोक्ष मार्ग का उपदेश दिया। मुनि वैराग्य सागर महाराज ने कहा कि आचार्य शांति सागर महाराज ने दक्षिण में जन्म लिया था और उत्तर भारत में प्रभावना के लिए चातुर्मास किए। तीर्थकरों ने जन्म लेकर उत्तर भारत को पवित्र किया, तथा बडे बडे आचार्यों ने दक्षिण में जन्म लेकर धर्म ग्रंथों की रचना कर ज्ञान का प्रचार किया। पूर्व में गुरु के अभाव में कई जैन श्रावक जैन धर्म को छोड़कर अन्य धर्म को अपना लिया था, इसलिए गुरु की महती आवश्यकता होती है।
मोक्ष मार्ग जानने के लिए गुरु की आवश्यकता होती है - जैन मुनि










