देवली में शान्ति सिन्धु व्यक्तित्व परिचर्चा के चतुर्थ दिवस मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने बताया कि आचार्य शान्तिसागर महाराज ने मुनियों के लिए उपदेश देते हुए कहा था कि एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती है, उसी प्रकार अर्थोपार्जन और आत्ममुखता एक साथ नहीं रह सकते है।
मुनि ने आगे बताया कि उन्होंने सभी को संयम धारण करने का उपदेश दिया क्योंकि संयम धारण किए बिना मोक्ष नहीं हो सकता है। आत्म चिन्तन के बिना आत्म तत्त्व का ज्ञान नहीं हो सकता है। आचार्य तो महा विभूति थे उन्हें किसी उपाधि से अंलकृत करना सूर्य को दीपक दिखाना है। अन्त में उन्होने अपने मुनि व्रत की साधना को सल्लेखना के साथ पूर्णाहूति की। छत्तीस दिन तक चली इस समाधि की क्रिया में पच्चीस दिन उपवास किए तथा मात्र 11 दिन थोडा सा जल ग्रहण किया। अन्त में उन्होंने किसी से भी सेवा नहीं करवाई। मुनि वैराग्य सागर महाराज ने कहा कि जब एक श्रावक श्रद्धापूर्वक समाधि मरण करता है, तो वह भी सात-आठ भव में मुक्ति प्राप्त कर सकता है, तब मुनि समाधि मरण करता है, तो वह उस भव से भी मुक्त हो जाता है। इस अवसर पर नीमच, लाडपुरा, कोटा से भी गुरुभक्त पधारे। इससे पूर्व रात्रि को जैन भजन जैमिंग का आयोजन हुआ जिसमें जिनवाणी फेम प्रखर जैन, आस्था जैन, अहिंसा जैन ने जैन भजनों से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया और सभी समाजजन देर रात्रि तक झूमे, नाचते, गाते रहे।
आत्म चिन्तन के बिना आत्म तत्त्व का ज्ञान नहीं हो सकता - जैन मुनि










