Ajay AryaAjay Arya 19-Apr-2026
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अक्षय तृतीया पर्व त्याग, तपस्या और दान-पुण्य के 'अक्षय' फल का प्रतीक है - विज्ञाश्री माताजी

अक्षय तृतीया पर्व त्याग, तपस्या और दान-पुण्य के 'अक्षय' फल का प्रतीक है - विज्ञाश्री माताजी

श्री महावीर दिगंबर जैन मंदिर देवली में अक्षय तृतीय पर्व गुरु मां 105 विज्ञाश्री माताजी के सान्निध्य में धूमधाम से मनाया गया। 
समाज के प्रवक्ता अंकित जैन डाबर ने बताया कि इस अवसर पर माताजी ने जैन धर्म में अक्षय तृतीया पर्व का महत्व दान दिवस के रूप में बताते हुए कहा कि जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने एक वर्ष तक निर्जल-निराहार तपस्या की थी। वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन उनका उपवास, राजा श्रेयांस द्वारा गन्ने के रस के आहार दान से टूटा था। जैन परंपरा में इस दिन विशेष रूप से आहार दान, ज्ञान दान, और औषधि दान का विधान है। इसे अक्षय पुण्य (अमर पुण्य) अर्जित करने का दिन माना जाता है। प्रातः माताजी के सान्निध्य में अभिषेक शांति धारा सम्पन्न हुई। इसके बाद धर्मसभा का आयोजन हुआ। इस अवसर पर समाज के सभी महिला और पुरुषों ने माताजी का आहार हेतु पड़गहांन भी किया। इसके बाद सभी को गन्ने के रस (इक्षु रस) का वितरण किया गया।
 


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