देवली के अटल उद्यान स्थित टीनशैड प्लेटफार्म पर चल रही 15 दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा ज्ञानयज्ञ महामहोत्सव में कथा वाचन कर रहे महामंडलेश्वर 1008 दिव्य मुरारी बापू ने कहा कि मनुष्य को हमेशा पद की लालसा बनी रहती है और पदासीन होने के बाद पदच्युत होते ही वह भूतपूर्व बन जाता है। भक्त और भगवान कभी भी कोई पद नहीं लेते हैं इसलिए भक्त और भगवान को कभी भूतपूर्व नहीं बनना पड़ता है।
उन्होंने बताया कि एक हजार चतुर्युगी का एक कल्प होता है, इसमें किसी न किसी त्रेता में प्रभु श्री राम का अवतार होता है। श्रीरामचरितमानस में चार कल्पों की कथा है। हम भले ही कितने बड़े हो लेकिन किसी की हंसी नहीं उड़ाना चाहिए, किसी के दिन अच्छे नहीं है तो उसे सम्हालना चाहिए। दूसरे की खराब परिस्थितियों पर हंसी उड़ाने वाला अच्छा नहीं होता। मनुष्य के ह्रदय में जिस देवता का भाव रहता है, भगवान भी उस भक्त को उसी रूप में दर्शन देते हैं। मंदिर में भगवान सगुण विराजमान रहते हैं, मनुष्य को मंदिर में हमेशा आंख खुली रहनी चाहिए। मंदिर के बाहर भगवान निर्गुण भाव से रहते हैं। भगवान शंकर रामायण में कहते हैं कि जिस तरह पानी का कोई रुप नहीं होता है, वैसे ही भगवान का कोई स्वरूप नहीं होता है। पानी को जिस पात्र में रखा जाएगा, वह वैसा ही रूप बना लेगा, वैसे ही भगवान भी भक्त के भाव के अनुसार सगुण साकार रूप में प्रकट होंगे। भगवान संसार में अवतार लेकर भक्तों के लिए आते हैं, लेकिन जब संसार में आ ही जाते हैं तो राक्षसों का भी संहार करते हैं। महात्मा लोग कहते हैं, हमें भौतिक सुविधाओं का कुछ शुल्क देना पड़ता है, लेकिन भगवान अपनी सुविधाओं का कोई शुल्क नहीं लेते, जैसे बिजली का बिल चुकाना पड़ता है, लेकिन सूर्य अपनी रोशनी का कोई शुल्क नहीं लेते। कथा के दौरान महिलाओं ने भाव विभोर होकर नृत्य किया। कथा का समापन आरती एवं प्रसाद वितरण के साथ हुआ।
श्रीराम कथा ज्ञानयज्ञ : पद के लालच में ही मनुष्य भूतपूर्व बनता है, भक्त और भगवान कभी भूतपूर्व नहीं होते - मुरारी बापू










