देवली के जैन मंदिर में चातुर्मास कर रहे मुनि वैराग्य सागर महाराज ने दशलक्षण पर्व के अन्तिम दिन उत्तम ब्रह्मचर्य पर्व पर प्रवचन करते हुए बताया कि पर द्रव्यों से दूर होकर आत्मा में लीन होना ही ब्रम्हचर्य है। आचार्यों ने काम को सर्वनाश का कारण कहा। ऊर्जा को ऊपर की ओर ले जाने के लिए ब्रम्हचर्य की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति का खानपान विकृत होने के कारण मन में वासना भी बढ़ रही है। आज विवाह की उम्र के बीत जाने पर विवाह होता है, इसलिए अनैतिक कार्य हो रहा है। सभा को सम्बोधित करते हुए मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने कहा कि दशलक्षण धर्म का सार ब्रह्मचर्य धर्म है। इन्द्रियों का समूह इतना बलवान है कि अच्छे-अच्छे विद्वान को भी अपने जाल में फंसा लेते हैं। उल्लू को दिन में नहीं दिखाई देता है, मनुष्य को रात में नहीं दिखाई देता है परन्तु कामान्ध को रात-दिन नहीं दिखाई देता है। एक बार के अब्रहम के सेवन से नौ लाख जीवों का घात होता है। वासना को नियन्त्रण करने के लिए अपने खान-पान, रहन-सहन और पहनावा को सही रखने की आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति में वासना की सीमित करने के लिए विवाह पद्धति कही गई। व्यक्ति की पूज्यता शील से ही है। संध्या पर सभी शिविरार्थी द्वारा महाआरती का आयोजन भी किया गया।
पर द्रव्यों से दूर होकर आत्मा में लीन होना ही ब्रम्हचर्य - जैन मुनि










