देवली के जैन मंदिर में क्षमावाणी पर्व पर मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने कहा कि जो अपनी गलती होने पर क्षमा मांगता है और दूसरों की गलती को क्षमा कर देता है, वह वीर कहलाता है।
मुनि ने कहा कि क्षमा कायरता का नहीं वीरता का प्रतीक है। जो उत्तम क्षमा को धारण करता है, वह पूज्य बन जाता है। क्षमा ऐसा अस्त्र है, जो बिना चोट पहुँचाएँ, शत्रु को भी जीत लेता है। क्षमा केवल वाणी मात्र में नहीं हो अन्तरंग में भी होनी चाहिए। वाणी की क्षमा में लच्हतेदार शब्द हो सकते है, पर अन्तरंग की क्षमा में अच्छोभावों की आवश्यकता होती है। सभा को सम्बोधित करते हुए मुनि वैराष्य सागर महाराज ने कहा कि भूल-चूक, गलतियाँ होना मानव स्वभाव है, परन्तु उसे स्वीकार करने वाला ही उत्तम क्षमा का धारी हो सकता है। क्रोध कई भव बिगाड देता है तो क्षमा एक ही में गुणित की प्राप्ति करा सकती है। क्षमा भाव धारण करने वाला प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भाव रखने वाला होता है।आचार्यों ने क्षमादान को महादान कहा है। हमें संसार के सभी प्राणियों के प्रति क्षमाभाव रखना चाहिए।
अपनी गलती स्वीकारना साहस का कार्य है - जैन मुनि










