देवली के जैन मंदिर में धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए मुनि वैराग्य सागर महाराज ने कहा कि आहारदान में सारे दान समाहित हो जाते है तथा आहार से प्राणों की रक्षा होती है। आहार से स्वास्थ्य ठीक हो सकता है, अतः औषधि दान भी हो गया और आहार ग्रहण कर साधक संयम का पालन करते है, अतः संयम का पालन करने में शरीर साधन है।
उन्होंने बताया कि पुराण ग्रंथों में राजा जंगलों में भी मुनियों के लिए आहार दान देते थे। सीता भी वन में रह कर भोजन बनाकर अतिथि का इन्तजार करती थी, और उन्हें भोजन कराने के बाद भोजन करती थी। उत्तम, मध्यम और जघन्य के भेद से दान के पात्र तीन प्रकार के कहे है। मुनिराज उत्तम पात्र है, प्रतिमाधारी मध्यम पात्र है तथा असंयमी सम्यग्दृष्टि जघन्य पात्र है। इन पात्रों को दान देनेवाला पुण्य का अर्जन करते हैं। सभा को सम्बोधित करते हुए मुनि सुप्रभसागर महाराज ने कहा कि आज के व्यक्ति पर संतोष नहीं है, इसलिए उनके पास समृद्धि और पुष्टि नहीं होती है। आज व्यक्ति स्वयं अशान्त है और दूसरों को भी अशांत करने का पुरुषार्थ करते है। संतुष्टि के बिना सुख-शान्ति, समृद्धि की प्राप्ति नहीं होती है। व्यक्ति बाहरी चमक से और अधिक आकृषित होते है, परन्तु अनादि से आत्मा की चमक फीकी पड गई है उस ओर ध्यान नहीं देता है। आत्मा कर्म रूप कालिमा से काली हो रही है, उसकी सारी चमक उसके कारण दब गई है। उस चमक को प्राप्त करने हेतु तीर्थंकरों के बताए मार्ग चलने की आवश्यकता है।
आहारदान में सारे दान समाहित है तथा आहार से प्राणों की रक्षा होती है - जैन मुनि










