देवली के जैन मंदिर में आयोजित धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि सुप्रभसागर महाराज ने कहा कि मोह रूपी अन्धकार को हरने के लिए और राग द्वेष की निर्वाति के लिए चारित्र को ग्रहण किया जाता है, मोहनीय कर्म अज्ञानी को बांधता है।
उन्होंने बताया कि जिन कारणों से संक्लेश होते है, पहले उसका त्याग करने की आवश्यकता है। संकलेश परिणाम ही संसार का कारण बनता है। आज व्यक्ति संग्रह की ओर दौड रहा है। उसकी आकांक्षा समाप्त नहीं होती है। जितना भौतिक समुह बढ़ रहा है, उतना संक्लेश बढ़ता जा रहा है। भौतिकता के फेर में व्यक्ति स्वयं को अकेला करता जा रहा है, परन्तु उसका वह अकेलापन उसे बाद में खटकने लगता है और उसके कारण तनाव में चला जाता है। मुनि ने सभा को उपदेश देते हुए कहा कि भगवान तो जन्म-मरण और बुढापा आदि दोषों से रहित है, उस निर्दोष अवस्था की प्राप्ति का लक्ष्य हमारा भी होना चाहिए। आज व्यक्ति अपने दोषों को ढकने का प्रयास करता है, लेकिन ढके नहीं रह पाते है। संसारी प्राणी वृद्धावस्था से डरता है, परन्तु शरीर तो प्रतिसमय नाश होता है। अब शरीर के क्षरण को छिपाने के लिए नाना प्रकार के उपाय करते हैं, परन्तु छिपाने से उसका क्षरण नहीं रुकने वाला है। भगवान जन्म-मरण को जीतने वाले है, अब उनका जन्म नहीं होगा क्योंकि उनका मरण नहीं होगा। जिसने मरण को प्राप्त किया है, उसका जन्म भी होगा।
जिन कारणों से संक्लेश होते है पहले उसका त्याग करने की आवश्यकता है - जैन मुनि










