देवली के महावीर दिगम्बर जैन मंदिर में शान्ति सिन्धु व्यक्तित्व परिचर्चा का शुभारम्भ ध्वजारोहण एवं मण्डप उद्घाटन के साथ हुआ।
मुनि वैराग्य सागर ने इस अवसर पर बताया कि जिस घर में कोई मुखिया नहीं होता है, वह घर नष्ट हो जाता है, जिस समाज में कोई नेता न हो तो वह समाप्त हो जाता है उसी प्रकार जिस धर्म को कोई गुरु न हो तो वह धर्म भी विलुप्त हो जाता है। आचार्य शान्ति सागर महाराज ने लुप्त प्रायः दिगम्बर श्रमण परम्परा को पुनः जीवित किया। उनके प्रभाव से आज इतने दिगंबर मुनि दिख रहे हैं। अब उस समय साधुओं की संख्या सीमित थी। उन्होने वृक्ष लगाया और आज हम उसके फलफुलता देख रहे है। मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि आचार्य शान्तिसागर महाराज ने आज आचार्य पद को स्वीकार कर दिगम्बर श्रमण परम्परा पर बड़ा उपकार किया और आचार्य पद का मान बढाया। उन्होने कर्नाटक में जन्म लिया और पूरे भारत में जैनधर्म का डंका बजाया, वह भूतो न भविष्यती है। महाराज ने मुनि पद का निरतिचार पालन कर वर्तमान मुनियों के लिए मार्ग निश्कंटक बना दिया। कार्यक्रम की जानकारी देते हुए अंकित जैन डाबर ने बताया कि आज आचार्य शान्तिसागर महाराज के गृहस्थ जीवन, परिवार, वंश परंपरा, विहार, दीक्षा एवं आचार्य पद पर परिचर्चा हुई। इससे पहले समाज और विभिन्न स्थानों से आये श्रद्धालुओ द्वारा आचार्य शान्तिसागर महाराज की पूजा एवं अर्घ समर्पित किये गए।
जैन मंदिर में शान्ति सिन्धु व्यक्तित्व परिचर्चा का शुभारम्भ










