देवली के महावीर दिगम्बर जैन मन्दिर में धर्म सभा को संबोधित करते हुए मुनि सुप्रभ सागर महाराज ने कहा कि आत्मा को चार गति चौरासी लाख योनियों में भटकते हुए अनन्त काल बीत गए अज्ञानता के कारण मनुष्य भव को प्राप्त करके भी दुःख प्राप्त किए। आज जिनेन्द्र भगवान की चरण शरण पाकर उसे धन्य कर लिया।
उन्होंने बताया कि जिनको स्वर्ग के देव, चक्रवर्ती भी पूजते है, ऐसे जिनेन्द्र भगवान् की सेवा पाकर अपने आपको धन्य मानों क्योंकि मिथ्यादृष्टि जीव भगवान के पास भी नहीं जाता है। संसार में कोई शरण देने वाला नहीं, कोई आधार भी नहीं है, जिनेन्द्र भगवान् को छोडकर मनुष्य भव एक बार प्राप्त होकर छूट जाए, तो पुनः मिलना कठिन है। जैसे रेत में हीरे की कणिका गिर जाए, तो उसका मिलना कठिन है। इस, मनुष्य भव को प्राप्त कर जिनेन्द्र भक्ति कर धन्य बनाना चाहिए। मुनि वैराग्य सागर महाराज ने कहा फि आज साधन सुविधाओं की सुगमता है, पहले नहीं थी। पहले शिक्षा प्राप्त करने में कठिनाइयाँ होती थी, पर व्यवहारिक अनुभव अधिक होता था, परन्तु आज शिक्षा सुलभ है, पर व्यवहारिक अनुभव कम है। इससे पूर्व संध्या पर आचार्य विद्या सागर महाराज की जीवन पर विद्याधर से विद्या सागर नाटिका आयोजन हुआ। बालब्रह्मचारी चंदन, संध्या के निदेशन में माया अजमेरा, रेखा कासलीवाल, वर्षा गोधा, ऋतु कासलीवाल के सहयोग में कई बच्चो ने आचार्य विद्या सागर महाराज के गृहस्थ जीवन से लेकर संलेखना तक का जीवन दर्शाया।
आज शिक्षा सुलभ है, पर व्यवहारिक अनुभव कम है - जैन मुनि










