सदियों से चला आ रहा ग्रामीण अंचल में आधुनिक फुटबाल का जनक माना जाने वाला व पारस्परिक सद्भावना रखने वाला लोक मान्यता का प्रतीक दड़ा महोत्सव अपनी विशेषताओं को अलग ही पहचान बनाए हुए है जो आज भी बड़े बुजुर्गो के सानिध्य में सद्भावना के साथ देवली उपखण्ड के आवां कस्बे में 14 जनवरी मकर सक्रांति को खेला जाएगा।
रियासत कालीन समय से दो मण यानि अस्सी किलोग्राम वजनी दड़े आधुनिक फुटबाल से पूर्ण जोश से खेले जाने वाला तीन घन्टे का खेल सामाजिक समरसता एवं लोक मान्यताओं का खेल है। जिसमें बिना द्वेषता, भेदभाव के हजारों लोग इस खेल को खेलने व देखने आते है। आवां सहित एक दर्जन गांवों के लोगो को समय की शुभता व अशुभता का आकलन दर्शाने वाला खेल द्वेषता को दूर रखते हुए आज भी खेला जाता है। बिना रेफरी के इस खेल से साल भर के समय का आकलन निकाला जाता है और अक्सर यह क्षेत्र के लोगो के लिए सच भी हुआ है। दड़ा रस्सी, बोरी टाट, से मिलकर बनाया जाता है जिसको दड़ा खेलने से एक दिन पूर्व गढ़ की बावडी में ड़ाला जाता है और शुरू होने से दो घन्टे पूर्व निकाला जाता है।
दोपहर को पंचो के सानिध्य में सवा बारह बजे दड़ा गढ़ के चौक में गोपाल भगवान को साक्षी मानते हुए लाया जाता है तथा पूजा अर्चना के बाद खेल शुरू होता है। आसपास के रामपुरा, संग्रामपुरा, कल्याणपुरा, बालापुरा, बिशनपुरा, सीतापुरा, हनुमानपुरा सहित बारह पूरे यानि 12 गावों के लोग खेलने के लिए आते है। दड़ा खेल में खिलाड़ी स्वंय ही बट जाते है। दूनी दरवाजे से आने वाले लोग एक तरफ रहते है और अखनिया दरवाजे की ओर से आने वाले लोग एक तरफ हो जाते है। पहले आस पास के लोग राजस्थानी कपडे पहन कर बेल गाडी में बैठ कर आते थे अब आधुनिकता के अनुसार ट्रैक्टर - ट्रोलियों, जीप, कार में आने लगे है। दोपहर तक गोपाल चौक की छते दर्शको से भर जाती है। और खेल शुरू होने तक महिलाएं राजस्थानी लोक गीत गाती रहती है। ज्यो ही दड़ा गढ़ के चौक में आता है महिलाएं व पूरूष उत्साहित होते रहते है और खेल शुरू हो जाता है। दोनो तरफ के खिलाड़ी एक दूसरे की और धकेलने में लगे रहते है। दड़ा जिस तरफ बढ़ता है तो उसी और की छतो पर बेठी महिलाएं खिलाडियो का हौसला बढ़ाने के लिए जोरदार हुटिंग मारती है जिसको राजस्थानी भाषा में बोकड़ा बोलना कहा जाता है। और खिलाडी जोश खरोश से ताकत लगाते हुए दूसरी और धकेलने का प्रयास करते है।
बुजुर्ग ग्रामीणों के अनुसार दड़ा महोत्सव के दिन अपरान्ह तीन बजे तक दड़ा दूनी दरवाजे की और जाता है तो पौ - बारह पच्चीस यानि शुभता व खुशहाली होती है और अखनिया दरवाजे की और जाता है तो अकाल यानि समय की पैदावार में कमी रहती है। ओर दड़ा खेल समय सीमा के रहते बीच में ही समाप्त होता है तो क्षेत्र में समय समान रहता है।
देवली उपखण्ड के आवां ग्राम में 14 जनवरी को खेला जाएगा दड़ा, शुभ-अशुभता का संकेत दर्शाता है दड़ा










